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हे प्रभु! मुझे तुम दुःख देना

General 13-12-2017 256

हे प्रभु! मुझे तुम दुःख देना

एक सूफी फकीर था, शेख फरीद। उसकी प्रार्थना में एक बात हमेशा होती थी – उसके शिष्य उससे पूछने लगे कि यह बात हमारी समझ में नहीं आती, हम भी प्रार्थना करते हैं, औरों को भी हमने प्रार्थना करते देखा है, लेकिन यह बात हमें कभी समझ में नहीं आती, तुम रोज-रोज यह क्या कहते हो कि हे प्रभु, थोड़ा दुःख मुझे तू रोज देते रहना! यह भी कोई प्रार्थना है? लोग प्रार्थना करते हैं, सुख दो, धन दो, ऐश और आराम दो ; और तुम हमेशा यही प्रार्थना करते हो, हे प्रभु, थोड़ा दुःख मुझे रोज देते रहना!

फरीद ने कहा कि सुख में तो मैं सो जाता हूँ और दुःख मुझे जगाता है। सुख में तो मैं अक्सर परमात्मा को भूल जाता हूँ और जब भी दुःख मेरे नजदीक होता है तो मुझे उसकी याद आती है। हमेशा से ही दुःख मुझे उस रब के करीब लाता है। इसलिए मैं प्रार्थना करता हूँ, हे प्रभु, इतना कृपालु मत हो जाना कि सुख-ही-सुख दे दे। क्योंकि मुझे अभी अपने पर भरोसा नहीं है। तू सुख-ही-सुख दे दे तो मैं सो ही जाऊँ! जगाने को ही कोई बात नहीं रह जाए।

अलार्म ही बंद हो गया। तू अलार्म बजाता रहना, थोड़ा-थोड़ा दुःख देते रहना, ताकि याद उठती रहे, मैं तुझे भूल न पाऊँ, तेरा विस्मरण न हो जाए। देखते हो, देखने के ढंग पर सब निर्भर करता है!

Please Note : The opinions/views expressed in the above article/content are the personal views/opinions of the author and do not represent the views of Nimbuzz or the Publisher MGTL.
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