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एक लघु कथा - हृदयावर्तन

Entertainment 14-12-2017 268

एक लघु कथा - हृदयावर्तन

♦ एक राजा को अपने राज्य को  भोगते हुए काफी समय हो गया था । उसके सर के बाल भी सफ़ेद होने लगे थे । एक दिन राजा ने अपने दरबार में एक उत्सव रखा और अपने गुरुदेव एवं सभी मित्र देशों  के राजाओं को भी आमन्त्रित किया । इस उत्सव को रोचक बनाने के लिए राज्य की सुप्रसिद्ध नर्तकी नयना को भी बुलाया गया ।
 
♦ राजा ने स्वर्ण मुद्रायें अपने मंत्रियो, गुरु और राजकुमारों को दीं, ताकि यदि वे चाहें तो नर्तकी के अच्छे नृत्य पर उसे पुरस्कृत कर सकें । राज नर्तकी ने नृत्य शुरू किया और सबका मनोरंजन करने लगी । जब  ब्रह्म मुहूर्त का समय आया तो नर्तकी ने देखा कि तबले वाला ऊँघ रहा है, क्योकि सभी को वो यह दर्शाना नहीं चाहती थी, उसने तबले वाले को जगाने के लिए एक दोहा पढ़ा -

 "बहु बीती रात, कुछ बची, पर पल पल गयी बिताय।
एक पलक के कारने, अब क्यों कलंक लग जाय ।"

♦ अब इस दोहे का सबने अलग अलग अर्थ निकाला । तबले वाला जो सोने वाला था, सतर्क होकर बजाने लगा । 

♦ जब यह बात गुरु जी ने सुनी तो उन्हें पश्चाताप हुआ,  उन्होंने सारी मोहरें उस नर्तकी के सामने फैंक दीं । 

♦ वही दोहा नर्तकी ने फिर पढ़ा तो राजा की लड़की ने अपना नवलखा हार खुश होकर राज नर्तकी को भेंट कर दिया । 

♦ उसने वही दोहा दुबारा दोहराया तो  युवराज ने उसी समय अपना स्वर्ण मुकुट   उतारकर नर्तकी को भेंट कर दिया । 

जब वह दुबारा दोहराने लगी तो गुरूजी बोले  इसने मेरी आँखें खोल दी हैं । यह कह रही है कि मैं सारी उम्र संयमपूर्वक भक्ति करता रहा और आखिरी समय में नर्तकी का मुज़रा देखकर अपनी साधना नष्ट करने यहाँ चला आया हूँ! मैं तो चला ।" यह कहकर गुरु जी तो अपना कमण्डल उठाकर जंगल की ओर चल पड़े ।

♦ राजा की लड़की ने कहा - "पिता जी ! मैं जवान हो गयी हूँ । आप आँखें मूंदे बैठे हैं, आप मेरी शादी नहीं कर रहे थे और आज रात मैंने महावत के साथ भागकर अपना जीवन बर्बाद कर लेना था । लेकिन इस नर्तकी ने मुझे सुमति दी है कि जल्दबाजी मत कर कभी तो तेरी शादी होगी ही । क्यों अपने पिता को कलंकित करने पर तुली है ?"

♦ युवराज ने कहा - "पिता जी ! आप वृद्ध हो चले हैं, फिर भी मुझे राज नहीं दे रहे थे । मैंने आज रात ही आपका कत्ल करवा देना था । लेकिन इस नर्तकी ने समझाया की  आज नहीं तो कल आखिर राज तो तुम्हें ही मिलना है, क्यों अपने पिता के खून का कलंक अपने सिर पर लेता है । धैर्य रख ।"

♦ जब ये सब बातें राजा ने सुनी तो राजा को भी आत्म ज्ञान हो गया । राजा के मन में वैराग्य आ गया । राजा ने तुरन्त फैसला लिया - "क्यों न मैं अभी युवराज का राजतिलक कर दूँ ।" फिर क्या था, उसी समय राजा ने युवराज का राजतिलक किया और अपनी पुत्री को कहा - "पुत्री ! दरबार में एक से एक राजकुमार आये हुए हैं । तुम अपनी इच्छा से किसी भी राजकुमार के गले में वरमाला डालकर पति रुप में चुन सकती हो ।" राजकुमारी ने ऐसा ही किया और राजा सब त्याग कर जंगल में गुरु की शरण में चला गया ।

♦ यह सब देखकर नर्तकी ने सोचा - "मेरे एक दोहे से इतने लोग सुधर गए, लेकिन मैं क्यूँ नहीं सुधर पायी ?" उसी समय नर्तकी में भी वैराग्य आ गया । उसने उसी समय निर्णय लिया कि आज से मैं अपना बुरा धंधा बन्द करती हूँ और कहा कि "हे प्रभु ! मेरे पापों से मुझे क्षमा करना । बस, आज से मैं सिर्फ तेरा नाम सुमिरन करुँगी ।"

♦ समझ आने की बात है, दुनिया बदलते देर नहीं लगती । एक दोहे की दो लाईनों से भी हृदय परिवर्तन हो सकता है । बस, केवल थोड़ा धैर्य रखकर चिन्तन करने की आवश्यकता है ।

♦ प्रशंसा से पिघलना नहीं चाहिए, आलोचना से उबलना नहीं चाहिए । नि:स्वार्थ भाव से कर्म करते रहें । क्योंकि इस धरा का, इस धरा पर, सब धरा रह जायेगा।

Please Note : The opinions/views expressed in the above article/content are the personal views/opinions of the author and do not represent the views of Nimbuzz or the Publisher MGTL.
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